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*भागवत श्रीकृष्ण चरितम 55*भगवान की कथा के सिलसिले मे श्री मद्भागवत के 10/22मे चीरहरण की कथा आती है।
लोगों के मन मे कुछ भ्रांतियां भी आती हैं कि श्रीकृष्ण जी ने गोपियों के बस्त्र हरण कर उचित नहीं किया,पर...जैसा कि मै कहता हूं पुराणों की शैली है कि कथा कुछ होगी पर उसका आध्यात्मिक अर्थ भी है,जो सारगर्भित है,संत उसे समझें,इसी को तत्व से जानना कहा गया है।
कथा कहती है कि गोपियां श्रीकृष्ण को पति रूप मे चाहती थी,अब ये सामाजिक अवधारणा कैसे हो सकती है?श्रीकृष्ण की उम्र 7,8साल की थी तो गोपियां भी 4,5,6 साल की तो,लौकिक शादी की बात है ही नहीं।
भक्ति मे,भक्त भगवान को पति रूप से मालिक,रुप से ठाकुर रूप से देखता है,गोपियों (जो पूर्व जन्म की महान तपी रही है,वे साधारण लडकियां नहीं हैं।)
वस्त्र क्या है,'आवरण' ताकि हमारी वास्तविकता अगला जान न जाय।
अगर गुरू से आवरण रखेगे तो सफल नहीं हो सकते,अपनी कमियां,गुप्त बाते भी बतानी होगी।श्रीकृष्ण सबसे महान गुरू है,गुरू डाक्टर जैसा होता है।डाक्टर के पास जाकर गुप्तांग मे तकलीफ है तो दिखाते है,ऐसे ही भक्त और भगवान मे चीर रूपी आवरण त्याज्य है।
'संशयात्मा विनश्यति' शास्त्र कथन है।परमात्मा की कृपा से ही संदेह रूपी जहर निकलता है,साधक क्लीन हो जाता है।
अर्जुन से भी पूरी गीता कहकर भगवान पूछते है,संदेह गया कि नहीं,तब अर्जुन कहते हैं 'गत् संदेहः स्मृति लब्धः ' यानी मेरे संदेह गत हो गये,मुझे स्मृति हो गयी है,'तो क्या करोगे '
अर्जुन कहते हैं,'करिष्ये बचनं तव' यानी अब आप जो कहेंगे वही करुंगा।
अर्जुन का भी संदेह रूपी चीर का हरण हुआ, और वे क्लीन हो गये।
यहां गोपियों को संदेह है कि ये नंद के छोरे हैं,सुंदर हैं,पैसे वाले है,इनको पति बना ले।
भगवान ने उनको ज्ञान कराया कि मै लौकिक रूप से किसी का छोरा हो सकता हूं पर वह मेरा छद्म रूप है,मै ही सत्य हूं,एकमात्र सृष्टि का कारण हूं।जैसे ही इस संदेह रूपी चीर का हरण हुआ, भगवान ने साक्षात्कार, करा दिया।
ये साक्षात्कार ही रास है,जो आगे के अध्याय मे है।
हरिः ओं तत्सत्
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Namner, Agra, Uttar Pradesh, India
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