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कुंडली में योग ग्रहों की विशिष्ट स्थितियों से बनते हैं जो जीवन में अपार सफलता, धन, स्वास्थ्य या संघर्ष निर्धारित करते हैं। मुख्य योगों में गजकेसरी (धन-ज्ञान), राजयोग (उच्च पद), पंचमहापुरुष योग (व्यक्तित्व), और विपरीत राजयोग (संकट में लाभ) शामिल हैं। ये योग ग्रहों की दशा के अनुसार शुभ या अशुभ फल प्रदान करते हैं। कुंडली के प्रमुख शुभ योग और उनके फल:
गजकेसरी योग:- गुरु और चंद्रमा के केंद्र (1, 4, 7, 10 भाव) में होने से बनता है। जातक धनी, बुद्धिमान और समाज में सम्मानित होता है।
पंचमहापुरुष योग:- मंगल (रुचक), बुध (भद्र), गुरु (हंस), शुक्र (मालव्य), और शनि (शश) अपनी उच्च या स्वराशि में केंद्र में हों। यह असाधारण व्यक्तित्व और सफलता देता है।
राजयोग: केंद्र - (1, 4, 7, 10) और त्रिकोण (1, 5, 9) के स्वामियों के संबंध से बनता है। यह राजा के समान जीवन, सुख-समृद्धि और मान-सम्मान देता है।
वसुमति योग:- केंद्र (1, 4, 7, 10) या उपचय भावों (3, 6, 10, 11) में शुभ ग्रह हों। यह निरंतर आय और सुख लाता है।
महालक्ष्मी योग: -लग्नेश त्रिकोण में हो और द्वितीयेश एकादश (11वें) भाव में हो। यह अत्यधिक धन और समृद्धि का योग है।
शुभ कर्तरि योग: लग्न के दूसरे और बारहवें भाव में शुभ ग्रह हों। जातक तेजस्वी, बलवान और सुखी होता है।
कुंडली के प्रमुख अशुभ या मिश्रित योग और उनके फल:
केमद्रुम योग: चंद्रमा के आगे और पीछे कोई ग्रह न हो। यह दरिद्रता, संघर्ष और मानसिक अशांति का कारक है।
विपरीत राजयोग: 6, 8 या 12वें भाव के स्वामी इन्ही भावों में बैठें। यह शुरुआती संघर्ष के बाद अचानक बड़ी सफलता और धन देता है।
दरिद्र योग:- पापी ग्रहों का केंद्र में प्रभाव। यह आर्थिक अस्थिरता लाता है।
मूक योग/बधिर योग:- बुध, गुरु या शनि की विशिष्ट युति से (जैसे 6/8वें भाव में) वाणी या सुनने में दोष (मूक/बधिर योग) हो सकता है।
विशेष जानकारी:
योग का फल तभी मिलता है जब संबंधित ग्रहों की महादशा या अंतर्दशा आए।
योग कितना प्रभावशाली होगा, यह ग्रहों की डिग्रियों (अंशों) और बली होने पर निर्भर करता है।
अशुभ योगों का उपचार (जैसे मंत्र, दान, रत्न) ज्योतिषीय परामर्श से किया जा सकता है।
आचार्य मनीष बड़थ्वाल ✍️
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Jagjeetpur, Haridwar, India
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