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Sun, 19 Jul, 2026 at 12:00 am

ज्ञान की यात्रा

  • Namner · Agra
\u0938\u0924\u094d\u0938\u0902\u0917 Publisher / Host सत्संग
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*ज्ञानी की यात्रा* (5)
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श्रीमद्भगवद् गीता के अध्याय 7 केश्लोक 19 का भाव है:
[ *अनेक जन्मों के बाद, जिसे (तत्व) ज्ञान प्राप्त होता है, वह (यह जानकर कि) वासुदेव (परमात्मा) ही सब कुछ हैं, मेरी शरण को प्राप्त होता है। ऐसा महात्मा अत्यंत दुर्लभ होता है।*]#सत्संग
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एक समय की बात है, भारत के एक प्राचीन नगर काशी में धर्मानंद नामक एक विद्वान और तपस्वी रहते थे। उन्होंने वर्षों तक वेद, उपनिषद् और शास्त्र पढ़े , लेकिन उनके हृदय में अभी भी परम सत्य की प्यास थी। वह अनेक जन्मों से साधना करते आ रहे थे, और इस जन्म में उनका ज्ञान एक उच्च स्तर पर पहुँच चुका था, पर पूर्णता नहीं मिली थी।
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​धर्मानंद ने पूर्ण ज्ञान की खोज में एक लम्बी और कठिन तीर्थ यात्रा का संकल्प लिया। वर्षों तक उन्होंने दुर्गम पहाड़ों और जंगलों में यात्रा की, अनेक संतों से मिले, और हर प्रकार की तपस्या की। उन्होंने हर देवता की पूजा की, हर तीर्थ का जल पिया, और हर विधि-विधान का पालन किया।
​एक दिन, वे एक अत्यंत शांत और एकांत स्थल पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने एक वृद्ध और तेजस्वी संत को ध्यान में लीन देखा। धर्मानंद ने आदर से उन्हें प्रणाम किया और अपनी वर्षों की साधना और ज्ञान की प्यास उनके सामने रखी।
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​संत ने आँखें खोलीं और मंद मुस्कान के साथ कहा, "वत्स धर्मानंद, तुम बहुत ज्ञानी हो और तुमने बहुत तप किया है। तुम्हारा मार्ग सही है, लेकिन तुम सत्य को 'ढूंढ' रहे हो, उसे 'देख' नहीं रहे हो।"
​धर्मानंद बोले, "भगवन्, क्या आप मुझे स्पष्ट रूप से बता सकते हैं कि मैं कहाँ चूक रहा हूँ?"
​संत ने उत्तर दिया, "तुमने ज्ञान को भागों में बाँट दिया है। तुम शिव को अलग देखते हो, शक्ति को अलग, और विष्णु को अलग। तुम तीर्थ को पवित्र मानते हो, लेकिन घर के आंगन को साधारण। तुम स्वर्ग को साध्य मानते हो, लेकिन इस संसार को माया। तुम हर जगह एक 'दूसरे' सत्य की तलाश कर रहे हो।"
​फिर संत ने गीता के 7/19 वें श्लोक को सुनाया:
*​"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते। वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥"*
​उन्होंने आगे समझाया, "यह श्लोक कहता है कि ज्ञान की पूर्णता तभी होती है, जब साधक अनेक जन्मों की साधना के बाद यह अनुभव करे कि 'वासुदेवः सर्वम् इति'—अर्थात् वासुदेव (परमात्मा) ही सब कुछ हैं। वह कण-कण में, हर जीव में, हर वस्तु में, हर विचार में, यहाँ तक कि हर दुःख और सुख में व्याप्त हैं।"
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​धर्मानंद ने आँखें बंद कर लीं और संत के शब्दों को अपने हृदय में उतारा। मनन चिंतन किया ,वर्षों के ज्ञान और तप का सार उन दो शब्दों में सिमट गया: वासुदेवः सर्वम्।
​उन्होंने उस क्षण अनुभव किया कि:
​जिस फूल की वे पूजा करते हैं, *वह भी वासुदेव है।*
​जिस नदी में वे स्नान करते हैं, *वह भी वासुदेव है।*
​जिन पत्थरों पर वे चलते हैं, *वे भी वासुदेव हैं।*
​वे स्वयं जो ज्ञान खोज रहे थे, *वह भी वासुदेव है।*
​और सबसे महत्वपूर्ण, सामने बैठे वृद्ध संत भी उसी वासुदेव की अभिव्यक्ति हैं।
​उनके मन से भेद-भाव का परदा हट गया। उन्हें अब कुछ भी 'तुच्छ' या 'अलग' नहीं लगा। उनके हृदय में प्रेम और करुणा का भाव उमड़ आया, क्योंकि अब उन्हें हर कोई परमात्मा का ही रूप दिखाई दे रहा था। उनका अहंकार गल गया, और उन्होंने पूरी विनम्रता से संत के चरणों में अपना मस्तक रख दिया।
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​संत ने उन्हें उठाते हुए कहा, "अब तुमने *बहूनां जन्मनामन्ते'* की यात्रा पूरी कर ली। तुमने जान लिया कि तुम केवल भगवान को भज नहीं रहे, बल्कि तुम स्वयं वासुदेव के भीतर हो और वासुदेव तुम्हारे भीतर हैं। यही पूर्ण ज्ञान है, और जो इस अवस्था को प्राप्त करता है, *'स महात्मा सुदुर्लभः'*—वह महात्मा अत्यंत दुर्लभ है।"
​धर्मानंद ने अपनी आगे की यात्रा किसी तीर्थ की खोज में नहीं, बल्कि हर पल 'वासुदेवः सर्वम्' की अनुभूति में जी।
​निष्कर्ष
[​इस कथा का बोध यह है कि सच्चा ज्ञान केवल शास्त्रों को पढ़ने या कर्मकांड करने से नहीं मिलता, बल्कि अनेक जन्मों की साधना के बाद, जब साधक का मन, बुद्धि और अहंकार शांत होता है, तब उसे यह अनुभव होता है कि परमात्मा (वासुदेव) ही इस संपूर्ण सृष्टि का मूल, आधार और अंतिम सत्य है। सब कुछ उसी से है, उसी में है। यही पूर्ण शरण है और ऐसी दृष्टि रखने वाला व्यक्ति अत्यंत दुर्लभ होता है।]
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Namner, Agra, Uttar Pradesh, India

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