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गीता 3/17

  • Namner · Agra
\u0938\u0924\u094d\u0938\u0902\u0917 Publisher / Host सत्संग
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\u0917\u0940\u0924\u093e 3\/17
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*गीता अध्याय 3/17*
@gitasatsang
#drhbpandey #सत्संग
डां.हरिवंश पाण्डेय
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[09/12, ऊपर के श्लोक मे बताया कि प्रवर्तित कर्म चक्र का आचरण करणीय है।प्रश्न है कि क्या सबके लिये करणीय है?इस पर श्लोक 17 कहता है-न-
*यस्त्वात्मरतिरेव मानवः । स्यादात्मतृप्तश्च आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ।।*
*यः तु मानवः* किन्तु जो व्यक्ति
*आत्मरतिः आत्मतृप्तः एव च* आत्माराम हैं और आत्मा में ही तृप्त रहने वाले हैं
*आत्मनि एव सन्तुष्टः च स्यात्* और आत्मा में ही सन्तुष्ट हैं
*तस्य कार्यम् न विद्यते* उनके लिये कोई कर्तव्य कर्म नहीं हैं ।
*किन्तु, जो व्यक्ति आत्माराम हैं और आत्मामें ही तृप्त रहनेवाल आत्मामें ही सन्तुष्ट हैं, उनके लिए कोई कर्त्तव्य कर्म नहीं हैं।*
*मनन-चिंतन*
संसार का करणीय कर्म व्यक्ति संतुष्टि के लिये करता है।कहा गया निष्काम कर्म करे और न कर सके तो सकाम ही करे, पर करे अवश्य।सामान्य व्यक्ति कर्म करता है क्योंकि उसे किसी चीज़ की इच्छा होती है (प्राप्ति, त्याग, फल की आसक्ति)।
​जिस व्यक्ति ने आत्मा का साक्षात्कार कर लिया है वह पूर्णतः संतुष्ट होते है, उसकी कोई इच्छा बाकी नहीं रहती।
​ जब कोई इच्छा ही नहीं है, तो उसे बंधनकारी कर्म (सकाम कर्म) करने की आवश्यकता भी नहीं रह जाती। वह कर्मफल के नियम से परे हो जाता है।
स्व मे स्थित साधक के लिये कोई भी कर्म करणीय नहीं रह जाता।क्योकि उसे यह अनुभव हो गया है कि आत्मा पूर्ण है, इसलिए वह बाहरी वस्तुओं की कमी महसूस नहीं करता। उसकी तृप्ति आंतरिक और शाश्वत होती है।
वैसे ऐसे साधक भी कर्म करते दिखते हैं ताकि मुझे कर्म करते देख अन्य जन भी कर्म करें।
उदाहरण ले सकते हैं ,एक बच्चा छोटा है तबतक छोटे खिलौने से खेलता है पर जब समझदार हो जाता है तो नही खेलता।ऐसे ही।स्व मे स्थित साधक आत्मा मे ही तृप्त रहता है,उसे तो अपने भोजन की भी याद नहीं रहती।जडभरत थे,उनको बच्चे की तरह कोई खिला दे तो खा लेते,नहीं तो उपासे ही रह जाते।
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Namner, Agra, Uttar Pradesh, India

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