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*आज सुबह का सत्संग,हरि स्मरण, योग योगेश्वर श्री कृष्ण के बचनो की प्रसादी के साथ*शिष्य ने पूछा--कुशल अकुशल कर्म क्या है?कुशल कर्म से राग करे या नही?यदि अकुशल कर्म छोड़े तो उससे द्वेष करे या नही?
गुरु ने कहा---
श्लोक:18/10
*न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते।*
*त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः॥*
भावार्थ:
*जो मनुष्य अकुशल कर्म से तो द्वेष नहीं करता और कुशल कर्म में आसक्त नहीं होता- वह शुद्ध सत्त्वगुण से युक्त पुरुष संशयरहित, बुद्धिमान और सच्चा त्यागी है।*
॥10॥
*तात्पर्य*
यहां भगवान कहते हैं, साधक जो शास्त्र सम्मत कार्य फल की इच्छा से करता है उससे पुनर्जन्म होता है,और जो शास्त्र निषिद्ध कर्म है उन्हें छोड़ देता है,क्योंकि ये नीच योनियों में ले जाते हैं, तो ये अकुशल कार्य हुए,इन्हें छोड़ता है,पर द्वेष नही करता,देखिए--
"न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म"-अकुशल कर्मो से द्वेष नही करता।
क्यों द्वेष कू नहीं करता,जब छोड़ता है,तो,इसलिए द्वेष नही करता कि अकुशल कर्म से तो छूट गए,पर द्वेष से संबंध बन गए जो बहुत ही बुरा है।
तो क्या कुशल कार्य यानी शास्त्र बिहित कर्म से राग करता है? इसपर कहते हैं-
"कुशले नानुषज्ज्ते"-कुशल कार्यो से राग भी नही करता।यानी आशक्त भी नही होता।
आगे कहते हैं-
"त्यागी"-ये कौन त्यागी?जो कुशल कर्म करने में राग नही औऱ अकुशल को छोड़ने से द्वेष नही वह असली त्यागी है।पर ये त्याग तब पूर्णता को प्राप्त होता है जब कर्मो को करने और न करने में निर्लिप्तता बनी रहे।
"मेधावी"-कौन है मेधावी?जिसके सभी कार्य सांगोपांग यानी ठीक ढंग से हो पर वे संकल्प और कामना से रहित होते है।इसी मेधाबी को गीता के4/18 में देख सकते हैं, वहा इसी को बुद्धिमान कहा गया।
"सत्वसमाविष्टो"-यह त्यागी चिन्मयता में स्वतः स्थित होता है।क्योंकि उसमे आशक्ति आदि नही होते।
,"छिन्नसंशय:"-वह छिन्न संसयी हो जाता है ,उसके संसय आदि स्माप्तहो जाते हैं, उसे कोई संदेह नही रहता,क्योंकि वह तत्व में अभिन्न भाव से स्थित होता है।
उस त्यागी के ये विशेषण हैं।
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Namner, Agra, Uttar Pradesh, India
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