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*चिंतन-मनन************
*शिष्य सत्यार्थ ने पूछा*
गुरू जी आपकी बात हम ठीक से समझ पा रहे हैं,पर मन बड़ा चंचल है,अगर इधर उधर भागे तो क्या करें?
*गुरू ने समझाया* मन से लड़ो मत,बस मन का साथ न दो और सोचो कि मै ध्यान मे हूं।6/26 है-
*यतो यतो निश्चरति मनः चंचलम् अस्थिरम्*
यह चंचल अस्थिर मन जहां जहां भी जिस शब्द आदि बिषयों की तरफ जाय
तो ....
*ततः ततो नियम्य एतद् आत्मनि एव वशं नयेत्*-
तब-तब इस मन को नियमित(उस बिषय शब्द आदिकी क्षणभंगूरता को सोचते हुये )कर बस मे कर आत्मा मे ही लगावे।
मन बहुत चंचल है इसे रोकना वायु को मुठ्ठी मे बंद करने जैसा कठिन है पर असंभव नही ,इसे अभ्यास और वैराग्य से नियमित किया जा सकता है।
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Namner, Agra, Uttar Pradesh, India
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