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*मनोहर और गयाराम*[ यह कहानी कर्म करने पर जोर देती है,आलस्य छोड़ कर्म करने में ही कल्याण है।]
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मित्रों!बुद्ध ने कहा, "आत्मदीपो भव" अर्थात अपने उन्नति के लिये तुम स्वयं खड़े हो जाओ।
भाव है आदमी अपनी उन्नति खुद करे।
गीता भी 6/5 मे कहती है--
*उद्धरेत्* उद्धार करे.
*आत्मना* -अपने द्वारा,
*आत्मानं* -अपना।
भाव खुद का उद्धार स्वयं करे।
स्वयं का उद्धार क्या है?
इसका मतलब है कि व्यक्ति को अपनी समस्याओं का समाधान खुद ही खोजना है, और अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रयास करना है।
उपनिषद भी आत्मा और ब्रह्म के संबंध पर जोर देते हैं, और यह बताते हैं कि व्यक्ति को अपने भीतर ही उस शाश्वत तत्व को खोजना चाहिए जो उसे मोक्ष की ओर ले जाएगा।
भगवान ने मनुष्य शरीर दी साथ मे विवेक भी दिया है,क्या उचित है क्या अनुचित व्यक्ति स्वयं ही तय करे,जो उचित हो,न्याय संगत हो वही कार्य अगर साधक करता जायेगा तो सफलता पायेगा,अगर अध्यात्म मे है तो परमात्मा की अनुभूति भी कर लेगा।
एक केस स्टडी लेते हैं--
दो मित्र थे मनोहर और गयाराम।
दोनो दोस्त थे।उन्होने व्यापार करने की सोची।बैंक से लोन लेकर एक एक टेम्पो खरीद लाये।
मनोहर सुबह उठता स्नान पूजा पाठ से जल्दी निबृत्त होकर अपनी गाड़ी को भी नमस्कार करता और कीमत पर चला जाता। दिन भर सवारियों को उठाता,उनके गंतव्य पर छोड़ता, मीठी वाणी वोलता, कभी जब कोई सवारी संकट मे होती तो सहायता भी कर देता।उसका नतीजा रहा कि लोग उसे काल करने लगे और अब उसका समय सवारी के इंतजार मे नही बीतता समय मे अधिक धन की प्राप्ति हो जाती।थोड़े ही दिनों मे उसने बैंक का ऋण भर दिया और अब कार भी ले लिया,कार को किराये पर चलवाता, समय बीतता गया, अब मनोहर से मनोहर सेठ कहा जाने लगा,पर पूजा और जरूरतमंद की सहायता पहले की तरह करता रहा।इस प्रकार उसने अपनी सहायता खुद की और इस लोक मे सुख भोगकर अंत मे परमात्मा को प्राप्त हुआ। मनोहर अपना उद्धार स्वयं से किया।
वही गयाराम आलसी था,सोता रहता,सवारियों से ज्यादा पैसे मागता,और लड़ता ।ऋण न चुका पाने के कारण बाहन को बैंक ने ले लिया।गयाराम किसी से लड़कर आज जेल मे है।
तो दोनों के पास समान अवसर थे ,पर मनोहर सफल हुआ और गयाराम असफल। इसीलिये श्लोक आगे कहता है-
*आत्मैव हि आत्मनो बन्धुः* -व्यक्ति अपना ही मित्र है ,और
*आत्मैव रिपुरात्मनः* स्वयं ही स्वयं का शत्रु भी है।
इसीलिये भागवत मे कहा है- मनुष्यशरीररूपी नौकाको पाकर मेरी कृपारूपी अनुकूल हवासे जो भवसागर को नहीं तरता अर्थात् अपना उद्धार नहीं करता (अपनी स्थिति सुदृढ नहीं करता)वह आत्महत्यारा ही है-- *'मयानुकूलेन नभस्वतेरितं पुमान् भवाब्धिं न तरेत् स आत्महा'* (श्रीमद्भा0 11। 20। 17)।
तो जिसने अपनी इंद्रियों पर बिजय पा ली वह स्वयं का मित्र और जो ऐसा नही कर पाया वह तो स्वयं का हत्यारा ही है।
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Namner, Agra, Uttar Pradesh, India
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