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*धर्मदत्त का हठ*(11)********
[ *जो पुरुष इस लोक में इस प्रकार परम्परा से प्रचलित सृष्टि-चक्र के अनुकूल नहीं बरतता अर्थात् अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता, वह इन्द्रियों के द्वारा भोगों में रमण करने वाला पापायु पुरुष व्यर्थ ही जीता है।" गीता 3/16*]
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एक बार की बात है, एक समृद्ध नगर में धर्मदत्त नाम का एक धनी व्यापारी रहता था। धर्मदत्त बहुत ही समझदार और सफल व्यक्ति था, लेकिन वह केवल अपने और अपने परिवार के बारे में सोचता था।
धर्मदत्त का सिद्धांत था कि वह अपना धन और समय केवल उन्हीं कामों में लगाएगा जिससे उसे सीधे लाभ मिले। वह यज्ञ (निःस्वार्थ सेवा) या समाज कल्याण के किसी भी कार्य को 'समय की बर्बादी' मानता था। उसका तर्क था, "मैं कर (टैक्स) देता हूँ, वही मेरा कर्तव्य है। बाकी सब काम सरकार या दूसरों का है।"
उस नगर में एक बड़ा तालाब था, जिससे सब किसान सिंचाई करते थे।
धर्मदत्त के खेत भी इसी तालाब से सीचा जाता था।
समय के साथ, वह तालाब गाद (कीचड़) से भरने लगा। गाँव के मुखिया ने
गांव वालों को बुलाया और
सब से तालाब की सफाई के लिए श्रमदान (स्वैच्छिक कार्य) का आग्रह किया।
गाँव के लोगों ने अपना काम, अपना श्रमदान, निभाने का वादा किया, लेकिन धर्मदत्त ने मना कर दिया। उसने कहा, "मेरे पास धन है, श्रम नहीं। मैं इन छोटे किसानों के काम क्यों करूँ?" धर्मदत्त के ना कहने से गांव के अन्य कयी लोग साथ नही दिये।
मुखिया ने उसे गीता के कर्मचक्र (3/16) की याद दिलाई, लेकिन धर्मदत्त हँस दिया।बोला यह सब बकवास है।
तालाब की सफायी का काम ठप पड़ गया।
दूसरे ही वर्ष , अकाल पड़ा। तालाब सूख गया, क्योंकि उसकी गाद नहीं निकलपाई थी। धर्मदत्त की अपनी बड़ी-बड़ी फसलें भी सूखने लगीं।
उसने अपने खेतों को बचाने के लिए दूर से पानी लाने की महंगी व्यवस्था की, लेकिन सफल न हो पाया।
जल्द ही, बाज़ार में अनाज की कमी हो गई, और उसके पास भी खाने-पीने की वस्तुओं की कमी होने लगी, क्योंकि अनाज पैदा करने वाले किसान ही उसके ग्राहक भी थे।
तब धर्मदत्त को एहसास हुआ। उसने सोचा,
"यदि मैंने अपनी सामर्थ्य के अनुसार यज्ञ (तालाब की सफाई) में भाग लिया होता, तो तालाब सूखता नहीं बल्कि पानी से लबालब भरा होता।"
तब अनाज पैदा होता,
सब का जीवन चलता, और मेरा व्यापार भी चलता।
उसे समझ आया कि सृष्टि का यह चक्र — कर्म, प्रकृति, वर्षा, अन्न, और फिर सबका योगदान — कितना आवश्यक है। जब वह केवल अपनी इंद्रियों और अपने स्वार्थ के लिए जिया, तो उसने इस चक्र को तोड़ा। परिणामस्वरूप, जब चक्र टूटा, तो उसका अपना जीवन और उसका धन भी व्यर्थ हो गया।
धर्मदत्त ने अपनी गलती मानी और शेष जीवन समाज कल्याण में लगा दिया। इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि जो व्यक्ति सृष्टि के इस 'कर्मचक्र' में अपना नियत कर्तव्य नहीं निभाता, जो केवल अपने भोगों में लिप्त रहता है, उसका जीवन व्यर्थ हो जाता है। क्योंकि हम इस समाज रूपी चक्र की एक कड़ी हैं, और एक कड़ी के टूटने से पूरा तंत्र प्रभावित होता है।
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