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*गीता अध्याय 3/22*@gitasatsang
#drhbpandey #सत्संग
डां.हरिवंश पाण्डेय
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ऊपर के श्लोक में बताया कि भले ही ज्ञानी हो,उसे लोक संग्रह के लिये कर्म करना चाहिये।फिर वे कहते हैं---
*न मे पार्थास्ति कर्त्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त्त एव च कर्मणि ।।*
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*पार्थ! मे कर्त्तव्यम् न अस्ति*
हे पार्थ! मेरे लिये कोई कर्त्तव्य करणीय नहीं
[यतः क्योंकि]
*त्रिषु लोकेषु किञ्चन अनवाप्तम् अवाप्तव्यम् न अस्ति*
तीनों लोकों में मेरे लिये कुछ भी अप्राप्त या प्राप्त करने योग्य नहीं है।
*कर्मणि वर्त एव च*
(तो भी मै)
कर्ममें ही प्रवृत्त हूं।
*हे पार्थ ! यद्यपि मेरे लिए कुछ भी करणीय कर्म नहीं है, क्योंकि मेरे लिए तीनों लोकोंमें कुछ भी अप्राप्त और प्राप्त करने योग्य नहीं है, तथापि मैं कर्ममें प्रवृत्त हूँ।*
*बिशेष*
भगवान कहते हैं—
“हे अर्जुन!
मुझे कुछ भी पाना नहीं है।
मेरे लिए कोई कर्तव्य बाकी नहीं है।
फिर भी मैं कर्म करता हूँ।”
अब प्रश्न उठता है—
जब भगवान को कुछ चाहिए ही नहीं, तो वे कर्म क्यों करते हैं?
*गहरा अर्थ*
भगवान कर्म इसलिए करते हैं क्योंकि—
दुनिया चलती रहे
लोग सही रास्ता सीखें
आलस्य और पलायन न फैले
अगर भगवान कर्म न करें तो लोग कहेंगे—
“जब भगवान ही कुछ नहीं करते, तो हम क्यों करें?”
इसलिए वे स्वयं उदाहरण बनते हैं।
*आसान उदाहरण*
मान लीजिए—
स्कूल का प्रिंसिपल
ऑफिस का मालिक
घर का मुखिया
उसे काम करने की ज़रूरत नहीं है,
फिर भी वह समय पर आता है, नियम निभाता है।
👉 ताकि बाकी लोग भी अनुशासन सीखें।
यही बात श्रीकृष्ण समझा रहे हैं।
🪔 *अर्जुन के लिए संदेश*
अर्जुन युद्ध से भागना चाहता था।
श्रीकृष्ण कहते हैं—
“अगर तू युद्ध नहीं करेगा,
तो लोग भी अपने कर्तव्य छोड़ देंगे।”
अर्थात— तेरा कर्म सिर्फ तेरा नहीं, समाज को भी प्रभावित करता है।
*आज के जीवन में सीख*
नौकरी करना = सिर्फ पैसा नहीं, कर्तव्य
माता-पिता होना = जिम्मेदारी
नागरिक होना = समाज के लिए योगदान
👉 कर्म छोड़ना समाधान नहीं
👉 कर्म को सही भाव से करना समाधान है
✨ इस श्लोक का सार
कर्तव्य करो,
फल की चिंता छोड़ो,
और अपने आचरण से दूसरों के लिए दीप बनो।
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Namner, Agra, Uttar Pradesh, India
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