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*गीता अध्याय 3/10*@gitasatsang
#drhbpandey
डां.हरिवंश पाण्डेय
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पिछले श्लोक 9मे कहा कि कर्म यज्ञार्थ करो।यज्ञार्थ या भगवदर्थ कर्म करने से कर्म बंधन नही होगा।
इस श्लोक मे यज्ञार्थ कर्म के बारे मे कहते हैं कि ब्रह्मा ने सृष्टि रच कर कहा कि--
*सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ।।*
*पूर्वे सहयज्ञाःप्रजा:सृष्ट्वा* आदिकालमें यज्ञाधिकारी ब्राह्मणादि को सृष्टकर *प्रजापतिः उवाच* प्रजापति ब्रह्माने कहा
*अनेन*
इस यज्ञके द्वारा *प्रसविष्यध्वम्* वृद्धिको प्राप्त होओ
*एषः* यह यज्ञ
*वः* तुम लोगोंको *इष्टकामधुक्* अभीष्ट कामनाओंको देने वला
*अस्तु* हो।
*आदिकालमें (सृष्टिके प्रारम्भमें) यज्ञाधिकारी ब्राह्मणों की रचना कर ब्रह्माने कहा- तुमलोग इस यज्ञके द्वारा वृद्धिको प्राप्त होओ और यह यज्ञ तुम लोगों की अभीष्ट कामनाओंको पूर्ण करनेवाला होवे ।*
श्वनाथ - तदेवाशुद्धचित्तो निष्कामं कर्मैव कुर्यात्, न्युक्तम्। इदानीं यदि च निष्कामोऽपि भवितुं न शक्नुय
*मनन चिंतन*
यज्ञ क्या है।. ...यज्ञ का भाव जन हिताय कर्म से है।ब्रह्मा ने कहा तुम एक दूसरे के हितार्थ कर्म करो इससे तुम दोनो उन्नति होगी।
साधारण व्यक्ति निष्काम कर्म करे अगर न कर सके तो सकाम ही करे पर उसे श्री हरि को समर्पित कर दे।श्लोकों 10-16 मे सहयज्ञ अर्थात यज्ञ के साथ कर्म को समझाया गया है।
*निष्कर्ष*
इस श्लोक में यह बताया गया है कि यज्ञ (परोपकार, कर्तव्य कर्म, शास्त्रानुकूल कर्म) ही मनुष्य की उन्नति और सभी कामनाओं की पूर्ति का साधन है। मनुष्य को यज्ञ (अपने कर्तव्यों) का पालन करते हुए ही जीवन में आगे बढ़ना चाहिए।
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